शब्दाक्षर

यह एक पंजीकृत साहित्यिक संस्था है। इसका मुख्यालय कोलकाता है। इस संस्था का गठन सन् 2012 में कोलकाता में किया गया।  इसके संस्थापक-अध्यक्ष श्री रवि प्रताप सिंह व उनके सहयोगियों की सक्रियता से, आज संस्था का विस्तार 25 राज्यों में हो चुका हैं, देश भर में 171 जिलों में जिला अध्यक्ष और अधिकतर में उनकी समितियाँ साहित्यरत हैं। राज्यों और जिलों में कार्य समितियाँ सतत साहित्यरत हैं। ‘शब्दाक्षर’ में देश-विदेश के कई जाने माने कवि-लेखक  जुड़े हैं । ‘शब्दाक्षर केंद्रीय’ वाट्सअप ग्रुप में, डॉ.उदय प्रताप सिंह, डॉ.कुँवर बेचैन,(अब स्वर्गीय) डॉ.सोम ठाकुर, डॉ.शिवओम अम्बर, डॉ.बुद्धिनाथ मिश्र, श्री दीक्षित दनकौरी, डॉ.अशोक रावत, श्री अशोक अंजुम, डॉ.कीर्ति काले, श्री चिराग जैन, श्री मृत्युंजय कुमार सिंह, श्री सत्येन्द्र सिंह ‘सत्य’, डॉ.प्रगीत कुँअर, डॉ.भावना कुँअर, डॉ.अनु सपन, श्री कैलाश मण्डेला, श्री जय राम सिंह ‘जय’, श्री बसंत जमशेदपुरी, श्री कल्याण सिंह शेखावत, श्री ‘मुकुंद’, श्री सूर्य नारायण गुप्त, शब्दाक्षर के विभिन्न पटलों पर मिला कर, 52 देशों के अप्रवासी रचनाकार जुड़े हुए हैं। श्री नरेश अग्रवाल (नेपाल), श्री राकेश खंडेलवाल (अमेरिका), कपिल कुमार (बेलजियम), श्वेता सिंह ‘उमा’ (रूस ), श्री राहुल उपाध्याय (अमेरिका), श्री इन्द्र अवस्थी (अमेरिका), आ.कुसुम शर्मा (कनाडा), श्री मनवीर मधुर, ए सी पी भोपाल-चौधरी मदन मोहन समर, श्री वेद व्रत वाजपेयी, श्री धर्मेंद्र सोलंकी, श्री बोधिसत्व, डॉ.ओमपाल सिंह ‘निडर’, कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, वाहिद अली वाहिद (अब स्वर्गीय) डॉ.गीता पंडित, डॉ.अशोक अंजुम, आ.किरण सिंह’, डॉ.बृजेश सिंह ‘बिलासपुरी’, जनाब चाँद शेरी, डॉ.गीरेंद्र सिंह भदौरिया ‘प्राण’, डॉ.माहेश्वर तिवारी, डॉ. रामेन्द्र त्रिपाठी, आई ए एस श्री सत्येंद्र रघुवंशी, डॉ.राज कुमार रंजन, डॉ.राहुल अवस्थी, श्री योगेन्द्र शुक्ल ‘सुमन’, डॉ.विनय भदौरिया, डॉ.मानसी द्विवेदी, एवं संतोष तिवारी ‘हिन्दवी’। अन्य और भी कई विश्व विख्यात कवि-लेखक ‘शब्दाक्षर केन्द्रीय’ व संस्था के अन्य 104 वाट्सअप पटलों पर, 46 फेसबुक ग्रुपों एवं 17 फेसबुक पेजों पर पठन-पाठन में सक्रिय हैं । पश्चिम बंगाल के संस्थागत साहित्यकार यथा, ‘कुमार सभा’ से, सर्वश्री महावीर बजाज, बंशीधर शर्मा, ‘परिवार मिलन’ से डॉ.दुर्गा व्यास, आर्य समाज’ से योगेशराज उपाध्याय,पश्चिम बंगाल हिन्दी अकादमी से श्री रावेल पुष्प, रचना सरण, ‘भारतीय संस्कृति संसद’ से, विजय झुनझुनवाला, डॉ.तारा दूगड़, ‘छपते छपते’ व ‘ताज़ा टी.वी’ से विश्वम्भर नेवर, साहित्य टाइम्स से डॉ. केयूर मजूमदार, ‘भारतीय भाषा परिषद’ से प्रो.संजय जायसवाल, ‘बैसवारा समाज’ से तारक दत्त सिंह, आनंद किशोर मिश्रा ‘मुन्ना’ ‘कान्यकुब्ज समाज’ से वीरेद्र त्रिवेदी, ‘उत्तरप्रदेश देशवारी समाज’ से तारक नाथ त्रिवेदी आदि साहित्यानुरागी समूहों में शामिल हैं । बंगाल के अन्य हिंदी सेवियों में, प्रो.राजश्री शुक्ला हिन्दी विभागाध्यक्ष, कोलकाता विश्वविद्यालय, प्रो.शुभ्रा उपाध्याय, प्रधानाचार्य-खुदीराम कॉलेज कोलकाता,’नाट्य जगत से उमा झुनझुनवाला, जीतेन्द्र सिंह ‘पत्रकारिता जगत’ से सर्वश्री कौशल किशोर त्रिवेदी, सुरेन्द्र सिंह, ओम प्रकाश मिश्रा, निर्भय देव्यांस, प्रकाश चण्डालिया, अनिल कुमार राय, सुधांशु शेखर, प्रदीप शुक्ला, जयकृष्ण वाजपेयी ,वनिता झारखण्डी, संदीप त्रिपाठी, संजय बिन्नानी, शकुन त्रिवेदी तथा राजेश शुक्ला  व अन्य शब्दाक्षर को शोभायमान कर रहे हैं । सभी रचनाधर्मियों  के सहयोग से ही ‘शब्दाक्षर परिवार’ अपने लक्ष्य की ऊँचाइयों को स्पर्श करने की ओर अग्रसर है।

संस्था का उद्देश्य हिन्दी साहित्य को जन जन के अंतस में स्थापित करना है। जहाँ-जहाँ, जिन  प्रदेशों और उनके जिलों में ”शब्दाक्षर’ की समितियाँ हैं, वहाँ जमीनी कार्यक्रम हो रहे हैं। जिसके अंतर्गत, मासिक काव्य-गोष्ठियाँ, सम्मान समारोह, पुस्तक लोकार्पण, कवि सम्मेलन, साहित्यिक सेमिनार, इत्यादि का आयोजन सुनिश्चित किया जा रहा है। ‘शब्दाक्षर’ के सभी लाइव कार्यक्रम के वीडियो ‘शब्दाक्षर के यूट्यूब चैनल’ “शब्दाक्षर राष्ट्रीय” मे सुरक्षित  कर लिए जाते हैं । शब्दाक्षर समूहों में, कार्यशालाएँ व स्वतंत्र लेखन-पठन निरन्तर जारी रहता है । 

संस्था की अपनी त्रैमासिक “शब्दाक्षर पत्रिका” भी प्रकाशित होती है,जिसमें ‘शब्दाक्षर’ के रचनाकारों की रचनाओं को ही शामिल किया जाता है।

शब्दाक्षर के अब तक तीन राष्ट्रीय साहित्योत्सव हो चुके हैं ।

               शब्दाक्षर साहित्योत्सव 2022~चेन्नई,तमिलनाडु

               शब्दाक्षर साहित्योत्सव 2023~हरिद्वार,उत्तराखंड

               शब्दाक्षर साहित्योत्सव 2024~लखनऊ,उत्तर प्रदेश

अब राष्ट्रीय साहित्यिक संस्था ‘शब्दाक्षर’ का त्रिदिवसीय राजस्थान साहित्योत्सव-2025 बंधे का बालाजी मंदिर,(राजमहल) झुंझुनू, राजस्थान  में आयोजित किया जा रहा है !!

दिनांक:-5-6-07 सितम्बर 2025 (हिंदी पख़वाड़ा)

शब्दाक्षर सरस्वती वंदना

(मरहटा छंद पर आधारित)

यश बुद्धि प्रदाता, शारद माता, कर दो तुम उद्धार।
‘शब्दाक्षर’ जन की, अंतर्मन की, सुन लो करुण पुकार।।

1
निष्ठा की निधि दो, माँ तुम सुधि दो, हमको करो निहाल।
साहित्यिक रण की, शब्दाक्षर की, बन जाओ माॅं ढाल।।
नित तुमको भजते, मन में जपते, ‘शब्दाक्षर’ के संत।
‘शब्दाक्षर’ अपना, सबका सपना, रहे सदा जीवंत।।
माँ तेज प्रखर हो, ख्याति अमर हो, दो ऐसा उपहार।
‘शब्दाक्षर’ जन की, अंतर्मन की, सुन लो करुण पुकार ।।

2
माँ आदि अंत तुम, वेद ग्रंथ तुम, तुम ही चारों धाम ।
तुमको अभिनंदन, माता वंदन, सत सत तुम्हें प्रणाम।।
तुमसे जो वंचित, होकर कुंठित, भटके सकल जहाँन।
ज्ञानी वह बनता, तुमको भजता, धरता निश दिन ध्यान।।
जग की महतारी, तारणहारी,महिमा अपरम्पार।।
‘शब्दाक्षर’ जन की, अंतर्मन की, सुन लो करुण पुकार।।

3
‘शब्दाक्षर’ के उर, बन कर के सुर, छेड़ो राग अलाप।
नाचेंगे छम छम, बनकर सरगम, ऐसी दो माँ थाप।।
‘शब्दाक्षर’ को वर, अविरल दो कर, इसका काव्य प्रवाह ।
हम सबकी इच्छा, करें प्रतीक्षा, इतनी सी बस चाह।।
हम शब्द सरित हों, भाव हरित हों, बरसे काव्य फुहार।।
शब्दाक्षर जन की, अंतर्मन की, सुन लो करुण पुकार ।।

4

शब्दाक्षर का हित, कैसे हो नित, मिल कर करें विमर्श।
सब युक्ति सुझायें, दिशा बतायें, किस विधि हो उत्कर्ष।।
साहित्य समर्पित, हो संकल्पित, धरें आपका का ध्यान।
हम अनुष्ठान कर, माॅं तुमको वर, गायें नित यशगान।।
मन को मकरंदित, करो सुगंधित, हर लो सभी विकार।
‘शब्दाक्षर’ जन की, अंतर्मन की, सुन लो करुण पुकार।।

रचनाकार~सत्येन्द्र सिंह ‘सत्य’

शब्दाक्षर राष्ट्रीय गीत

हिंदी की अलख जगाते हैं।
हम शब्दाक्षर कहलाते हैं।।

भारत माँ की बिंदी को हम।
सदा समर्पित हिंदी को हम।।
साख नहीं इसकी गिर पाये।
कहीं न ये हिंदी मिट जाये।।
सबको अहसास कराते हैं।
हम शब्दाक्षर कहलाते हैं।।

नित्य ध्यान शारद का धरके।
सतत साधना उनकी करके।।
प्राप्त हुआ अनुकंपा का फल।
काव्य कला का अद्भुत कौशल।।
जन-जन को हम सिखलाते हैं।
हम शब्दाक्षर कहलाते हैं।।

उर के सब गहरे घावों को।
व्यथित हृदय के मन भावों को।।
सरगम के सुर साज सजाकर।
ग़ज़ल छंद नवगीत सुनाकर।।
अंतस को हम सहलाते हैं।
हम शब्दाक्षर कहलाते हैं।।

हिंदी हैं हम हिंद निष्ठ हैं।
अति उत्तम हम अति विशिष्ट हैं।।
बनकर दिनकर, पंत, निराला।
धधका कर हिंदी की ज्वाला।।
तम को हम दूर भगाते हैं।
हम शब्दाक्षर कहलाते हैं।।

काव्य जगत के काव्य पुरोधा।
शब्दाक्षर के हैं वे योद्धा।।
जोश अपार हृदय में भर के।
शंखनाद शब्दों का करके।।
धरती-अम्बर गुंजाते हैं।
हम शब्दाक्षर कहलाते हैं।।

हृदय तार को झंकृत कर दे
सरगम का शारद वो वर दे।
गद्य- पद्य की पंक्ति- पंक्ति पर
गूँज उठे ‘शब्दाक्षर’ का स्वर।
निश-दिन यह टेर लगाते हैं।
हम शब्दाक्षर कहलाते हैं।।

हिंदी का करते विरोध जो।
निंदक भारत माता के वो।।
भाषा के इस द्वन्द युद्ध में।
इकजुट हो उनके विरुद्ध में।
परचम को हम लहराते हैं।
हम शब्दाक्षर कहलाते हैं।।

ग़ज़ल छंद गीतों के पथ का।
‘रवि’ के इस साहित्यिक रथ का।।
छंद गुरू श्री ‘सत्य’ सारथी।
करके ‘केवल’ ‘ज्योति’ आरती।
मन को सबके हर्षाते हैं।
हम शब्दाक्षर कहलाते हैं।।

रचनाकार-रवि-सत्य-ज्योति।

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